
“ये कुत्ते ‘दिल्लीवाले’ हैं” — जॉन अब्राहम ने CJI को पत्र लिखा; सुप्रीम कोर्ट के आदेश की समीक्षा की मांग 🐾
दिल्ली-एनसीआर में हालिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है — कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों से सभी आवारा (कम्युनिटी) कुत्तों को उठाकर शेल्टर्स या दूर के स्थानों पर भेजने का निर्देश दिया, जिसे लागू करने के लिए आठ हफ्तों का समय भी दिया गया। इस आदेश के बाद प्रसिद्ध अभिनेता जॉन अब्राहम ने मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई को पत्र लिखकर इस फैसले की समीक्षा की मांग की है और कहा है कि यह कदम मानवता तथा मौजूदा नियमों के विरुद्ध है।
इस लेख में हम सरल और पढ़ने वाले अंदाज़ में यह समझाने की कोशिश करेंगे कि क्या हुआ, क्यों विवाद हो रहा है, जॉन अब्राहम ने क्या कहा, विशेषज्ञ और एक्टिविस्ट क्या कहते हैं, और आगे क्या हो सकता है — ताकि आप पूरा मुद्दा आराम से समझ सकें। 😊
सुप्रीम कोर्ट का आदेश — क्या कहा गया और क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर जितने भी आवारा (community) कुत्ते हैं, उन्हें उठाकर पर्पस-बिल्ट शेल्टर्स में रखा जाए और अगर किसी जगह पर उनकी मौजूदगी से सुरक्षा-समस्याएँ बन रही हों तो तत्काल कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने यह चिंता जताई कि बढ़ते कुत्ते-हमलों और रेबीज़ से जुड़ी घटनाओं को रोकना ज़रूरी है और यह कदम इसलिए लिया जा रहा है। इस आदेश में स्टेरिलाइज़ेशन और वैक्सिनेशन की बात भी आई है, पर कोर्ट ने मौजूदा पालिसी को अप्रभावी बताया है।
जॉन अब्राहम का पत्र — मुख्य बिंदु क्या थे?
जॉन अब्राहम ने CJI को लिखे अपने पत्र में इस आदेश को “अमानवीय, अव्यवहारिक और अवैध” करार दिया। उन्होंने आग्रह किया कि इन कुत्तों को ‘strays’ न कहकर ‘community dogs’ माना जाए, क्योंकि बहुत से कुत्ते दशकों से किसी स्थानीय समुदाय के साथ जुड़े होते हैं और लोगों द्वारा खिलाए-पलाए जाते हैं। जॉन ने कहा कि यह कदम Animal Birth Control (ABC) Rules, 2023 के विरुद्ध है और इसे लागू करने से ‘वैक्यूम इफ़ेक्ट’ पैदा होगा — यानी खाली जगह पर नए, बिना टीकाकरण वाले कुत्ते आ सकते हैं, जिससे समस्या और बढ़ सकती है।
बॉलीवुड और आम लोगों की प्रतिक्रिया
जॉन अब्राहम के पत्र के बाद कई अन्य कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों ने भी इस आदेश की निंदा की। जान्हवी कपूर, वरुण धवन, वीर दास और रवीना टंडन जैसे कई सितारों ने ट्वीट या स्टेटमेंट में कहा कि पूरे समुदाय के कुत्तों को हटाना उन्हें “मौत की सज़ा” जैसा है और बेहतर विकल्प नसबंदी-नीति, बड़े पैमाने पर टीकाकरण, फीडिंग ज़ोन और गोद लेने (adoption) को बढ़ावा देना है।
एक्टिविस्ट और पशु-कल्याण समूह क्या कह रहे हैं?
एनजीओ और पशु-कल्याण कार्यकर्ता मानते हैं कि भारत में कई सालों से लागू की जा रही Animal Birth Control (ABC) नीति — यानी पकड़कर नसबंदी (sterilization), टीकाकरण और फिर वापस उसी इलाके में छोड़ना — ही व्यवहारिक और मानवीय तरीका है। उनका तर्क है कि अचानक हटाने से कुत्तों के स्वास्थ्य पर बुरा असर होगा, शेल्टर्स में गिने-चुने संसाधन होने की वजह से पशुओं की भलाई प्रभावित होगी, और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज़ से भी समस्या बनी रहेगी क्योंकि नए, अनकंट्रोल्ड जानवर आ सकते हैं।
कानूनी और नीति संबंधी बहस
कानूनी तौर पर यह मामला जटिल है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट का फ़ोकस सार्वजनिक सुरक्षा और बच्चों-वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा पर है, दूसरी ओर जानवरों के हक़ और दयालु प्रथाओं को लेकर अलग-अलग कानून और दिशा-निर्देश मौजूद हैं। कुछ विधिवेताओं और समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह आदेश विशेषज्ञों की सलाह और Ground-level (स्थानीय) डाटा के बिना लिया गया लगता है, जिससे लागू करने में व्यवहारिक अड़चनें आएंगी।
वैक्यूम इफ़ेक्ट — इसे हल्के में क्यों नहीं लेना चाहिए?
“वैक्यूम इफ़ेक्ट” का मतलब है कि यदि किसी इलाके से कुत्तों को हटाया जाता है, तो खाली हुए संसाधन (खाना, ठिकाना) को भरने के लिए आसपास से नए कुत्ते आ जाते हैं। यदि नए आने वाले कुत्ते नसबंदी या वैक्सीन से मुक्त होंगे, तो बीमारी का खतरा और झगड़े बढ़ सकते हैं। इसलिए सिर्फ़ ‘हटाना’ अस्थायी समाधान हो सकता है — दीर्घकालिक और स्थायी समाधान के लिए नसबंदी, निरंतर टीकाकरण और समुदाय-स्तर पर जागरूकता ज़रूरी है।
शेल्टर्स कब तक समाधान हो सकते हैं?
शेल्टर्स अगर ठीक तरह से संसाधन-युक्त, स्वच्छ और वैज्ञानिक तरीके से संचालित हों तो वे कुछ राहत दे सकते हैं — पर सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में कुत्तों के लिए शेल्टर्स कहाँ और कैसे तैयार किए जाएँगे? आर्थिक लागत, देखभाल का मानक, पशुओं की भीड़ और उनके मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य जैसी चुनौतियाँ हैं। कई एक्टिविस्ट कहते हैं कि शेल्टर बनाना और वहाँ रखने से समस्या जटिल हो सकती है जब तक कि नसबंदी और कम्युनिटी-लाइफ के लिए समेकित योजना न बनाई जाए।
क्या कोई मध्यपंथी रास्ता निकाले जा सकता है?
- तेज़ और व्यापक ABC (पकड़ कर नसबंदी + वैक्सीन) अभियान चलाया जाए।
- फीडिंग ज़ोन और कम्युनिटी-मैनेजमेंट के नियम बनाए जाएँ।
- खराब व्यवहार करने वाले जानवरों को ही अलग कर के उपचार और जरूरत पड़ने पर भर्ती किया जाए।
- समुदाय और स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण और संसाधन दिए जाएँ ताकि वे स्थानीय समाधान में भागीदार बनें।
जॉन अब्राहम का पत्र समाज पर क्या असर डाल सकता है?
जब कोई सार्वजनिक हस्ती संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर अपने विचार रखती है, तो उससे जनता में चर्चा तेज़ होती है और नीति निर्माताओं पर दबाव बनता है। जॉन का पत्र अदालत तक पहुंचने से यह मुद्दा और अधिक कानूनी और सार्वजनिक जांच के दायरे में आ गया है — और इससे अभियानों, पब्लिक विडियोज़ और मीडिया कवरेज की संख्या बढ़ती है, जो अधिकारियों को नीतियों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है। पर साथ ही इस पर भावनात्मक रूप से विभाजन भी आया है — कुछ लोग सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर कोर्ट के कदम का समर्थन करते हैं।
अगर आप एक आम नागरिक हैं — तो क्या कर सकते हैं?
- स्थानीय पशु-कल्याण समूहों से संपर्क करें और निगरानी या फीडिंग ज़ोन की मदद करें। 🐕🦺
- सुरक्षित व्यवहार के बारे में बच्चों और बुज़ुर्गों को बताएं — कैसे पास जाएँ, कब दूरी बनानी है।
- स्थानीय निकायों से अनुरोध करें कि वे ABC कार्यक्रम तेज़ करें और संसाधन दें।
- यदि आप कोई घायल या बीमार कुत्ता देखें, तो नज़दीकी पशु क्लिनिक या NGO को सूचित करें।
अंतिम विचार — कानून, दया और व्यावहारिकता के बीच संतुलन
यह मुद्दा सिर्फ़ पशु-हित बनाम मानव-हित का सरलीकृत द्वंद नहीं है — इसमें कानून, सार्वजनिक स्वास्थ्य, समुदाय की भावनाएँ और व्यवहारिक संसाधन सब जुड़े हुए हैं। जो निर्णय हो, वो वैज्ञानिक प्रमाण, स्थानीय डेटा और जानवरों की भलाई को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए। जॉन अब्राहम का पत्र इस बहस को और व्यापक बनाता है और अदालत से उम्मीद की जा रही है कि कोई संयमित, वैकल्पिक और दीर्घकालिक नीति पर विचार किया जाए।
Read More: नीचे टिप्पणी में अपनी राय साझा करें — क्या आपको लगता है कि कुत्तों को हटाना सही है या ABC जैसी नीतियाँ ही बेहतर हैं? 🗣️