🌉 35 साल से अधूरा सपना: मऊ के बंदीघाट गांव में पुल न होने से छात्रों की जान जोखिम में
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले का एक छोटा सा गांव — बंदीघाट — आज भी विकास की मुख्य धारा से दूर खड़ा है। यहां के लोग पिछले 35 सालों से एक पुल की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं। 😔
इस पुल के न होने का सबसे बड़ा नुकसान स्कूल जाने वाले बच्चों और आम ग्रामीणों को उठाना पड़ रहा है।
📍 गांव की रोज़ की सच्चाई
हर सुबह बच्चे किताबें लेकर निकलते हैं, लेकिन स्कूल तक पहुंचने के रास्ते में एक नदी उनका इंतज़ार करती है।
बरसात के मौसम में यह नदी डरावनी बन जाती है — तेज बहाव, गहरा पानी और फिसलन भरे पत्थर। 🌊
कई बार बच्चे:
- नंगे पैर नदी पार करते हैं 😟
- कपड़े सिर पर रखकर पानी में उतरते हैं
- कभी-कभी स्कूल जाना छोड़ देते हैं
सोचिए, पढ़ाई से ज्यादा उन्हें अपनी जान बचाने की चिंता करनी पड़ती है।
🎒 पढ़ाई पर सीधा असर
गांव के कई बच्चों की स्कूल में उपस्थिति बेहद कम हो चुकी है।
माता-पिता डर के कारण कई बार बच्चों को रोक लेते हैं।
एक ग्रामीण पिता कहते हैं —
“पढ़ाई जरूरी है, लेकिन जान उससे भी ज्यादा जरूरी है।” 😢
जब नदी उफान पर होती है, तब पूरा गांव लगभग कट जाता है।
न डॉक्टर पहुंच सकता है, न शिक्षक, न कोई मदद।
🏥 बीमार पड़ने पर और मुश्किल
अगर किसी को अचानक तबीयत खराब हो जाए तो हालात और भी खतरनाक हो जाते हैं।
लोगों को या तो:
- कई किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है 🚶
- या फिर जोखिम लेकर नदी पार करनी पड़ती है
कई बार समय पर इलाज न मिलने से हालत बिगड़ जाती है।
⏳ 35 साल से सिर्फ वादे
ग्रामीणों के अनुसार:
- हर चुनाव में पुल का वादा होता है 🗳️
- नेता आते हैं, भाषण देते हैं
- फिर सब भूल जाते हैं
फाइलें घूमती रहती हैं, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं होता।
लोगों का धैर्य अब जवाब देने लगा है।
👨👩👧 ग्रामीणों का दर्द

एक बुजुर्ग महिला बताती हैं —
“हमने जवानी में पुल की मांग की थी, अब बुढ़ापे में भी वही मांग है।” 😞
युवाओं का कहना है कि अगर पुल बन जाए तो:
- बच्चे सुरक्षित स्कूल जा सकेंगे 📚
- नौकरी के मौके बढ़ेंगे 💼
- गांव का विकास होगा 🌱
⚠️ हर बरसात में बढ़ता खतरा
मानसून आते ही गांव में डर का माहौल बन जाता है।
तेज पानी कई बार लोगों को बहा ले जाने तक की नौबत ला चुका है।
इसके बावजूद मजबूरी में लोग रोज़ नदी पार करते हैं।
क्योंकि दूसरा रास्ता बहुत लंबा और मुश्किल है।
📢 प्रशासन से गुहार
ग्रामीणों ने कई बार:
- जिलाधिकारी को ज्ञापन दिया 📄
- जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की
- प्रदर्शन भी किया
लेकिन नतीजा वही — सिर्फ आश्वासन।
🌍 विकास की असली तस्वीर
जहां एक तरफ बड़े शहरों में फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे बन रहे हैं,
वहीं दूसरी तरफ बंदीघाट जैसे गांव आज भी एक छोटे पुल के लिए तरस रहे हैं।
यह सवाल उठता है —
क्या गांव के बच्चे सुरक्षित रास्ते के हकदार नहीं हैं? 🤔
💔 कब पूरा होगा सपना?
35 साल बहुत लंबा समय होता है।
एक पीढ़ी पैदा होती है, बड़ी होती है और बूढ़ी हो जाती है — लेकिन पुल नहीं बनता।
आज भी गांव के लोग उसी उम्मीद में हैं कि शायद इस बार सरकार उनकी सुनेगी। 🙏
📌 निष्कर्ष
बंदीघाट गांव की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं है,
बल्कि उन हजारों गांवों की है जहां बुनियादी सुविधाएं अब भी सपना हैं।
अगर जल्द पुल नहीं बना, तो:
- बच्चों की पढ़ाई और गिरेगी 📉
- दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ेगा ⚠️
- गांव विकास से और पीछे रह जाएगा
अब जरूरत है सिर्फ वादों की नहीं, बल्कि काम की।