जानकी सेना संगठन की तृतीय कार्यकारिणी बैठक संपन्न


शिवपुरी। मां जानकी सेना सगठन आज जिले ही नहीं अपितु पूरे प्रदेश भर के 9 जिलों में निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है संगठनात्मक तौर पर देखा जाए तो एक संगठन को चलाने के लिए जिस तरह की प्रक्रिया का प्रयोग होना चाहिए जिला अध्यक्ष विक्रम सिंह रावत वह सभी प्रक्रियाएं पूरे मनोयोग के साथ की जा रही है जिसमें संगठन के सभी सदस्य लगातार सहयोग भी कर रहे हैं आगामी दिनों में संगठन क्या करने वाला है इस बात की रणनीति पहले ही संगठन के द्वारा बना ली जाती है और इसी हेतु हर महीने के आखरी में कार्यकारिणी बैठक का आयोजन संगठन के द्वारा किया जाता है इसी क्रम में बीते रोज 31 जनवरी को एसपी कोठी के पास ठाकुर बाबा मंदिर पर मां जानकी सेना संगठन की वृहद बैठक का आयोजन संगठन के उपाध्यक्ष लेखराज राठौर के द्वारा किया गया जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार एवं लेखक प्रमोद भार्गव को आमंत्रित किया गया जिन्होंने संबोधन के माध्यम सेअपना मार्गदर्शन दिया। आपको बता दें कि मां जानकी सेना संगठन अनवरत पिछले लगभग साढे 6 साल से सुंदरकांड का आयोजन करती आ रहा है बीते रोज 30 जनवरी को 337 वा सुंदरकांड का आयोजन सीताराम मंदिर निचला बाजार में संगठन की सदस्य संदीप शर्मा एआरआई नगरपालिका के व्यवस्थापन में रखा गया था। जहां पर मुख्य अतिथि के रूप में बाणगंगा मंदिर से पधारे महामंडलेश्वर नारायण दास जी महाराज,कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी, पंडित अजय शंकर भार्गव, पंडित केदार समाधिया आदि उपस्थित हुए। उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि वीरेंद्र रघुवंशी ने दिनों दिन बढ़ते संगठन को और प्रगति की ओर अग्रसर करने की शुभकामनाएं दी।उन्होंने कहा कि मां जानकी सेना संगठन का परिवार धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है और मां जानकी की कृपा ऐसे ही बनी रहे और यह संगठन अपना विस्तृत रूप धारण करता रहे यही कामना है। वहीं 31 जनवरी को ठाकुर बाबा मंदिर पर आयोजित कार्यकारिणी बैठक के दौरान वरिष्ठ साहित्यकार लेखक एवं पत्रकार प्रमोद भार्गव ने कहा कि जानकी माता,जिनका प्रचलित नाम सीता है, एक संघर्षशील और जुझारू महिला थीं।रावण ने छलपूर्वक जब उनका अपहरण किया तभी से रावण के विरुद्ध उनका संघर्ष शुरू हो गया था।उन्होंने चीख पुकार लगाई की यह दुष्ट मुझे अपहरण करके ले जा रहा है।पुकार सुनकर जटायू उनकी मदद के लिए आए।सीता ने अपने गहने भी उतारकर फेंके।अशोक वाटिका में भी वे शांत नहीं बैठीं।उन्होंने ही विभीषण को लंका का सम्राट बनाने का विश्वास दिया और फोड़ लिया।उन्होंने जो सेवक सेविकाएँ उनकी रक्षा में थे,उन्हें भी रावण के विरुद्ध भड़काया और उनके माध्यम से लंका की गुप्तचरी की।यानी उनमें नेतृत्व व संगठन की क्षमता बचपन से ही थी,इसलिए इस संगठन का नाम जानकी सेना रखना उचित है।भगवान राम तो वनवासी के रूप वनगमन किए थे,लेकिन उन्होंने सीता हरण के बाद वानर सेना को एक ऐसे शक्तिशाली सैन्यबल में बदल दिया,जिसने रावण की सेना को परास्त कर दिया।साफ है, संगठन का अपना महत्व है और बिना संगठन के कोई समाज या देश शक्तिशाली नहीं बन सकता है। संगठन में नवीन सदस्यों को शामिल कर हार-माला पहनाकर संगठन में स्वागत किया गया। संगठन में सदस्यों की संख्या अब उन्नीस सौ पर पहुंचने वाली है। यहीं पर आयोजक संदीप शर्मा के द्वारा भोजन व्यवस्था का प्रबंध भी किया गया था।

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