
अमरोहा का दर्दनाक सच: दहेज के लिए महिला को पिलाया एसिड, 17 दिन बाद मौत 💔
उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरे प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। दहेज की मांग पूरी न करने पर एक नवविवाहिता को उसके ही ससुरालवालों ने जबरन एसिड पिला दिया। 17 दिन तक उसने अस्पताल में तड़प-तड़प कर मौत से लड़ाई लड़ी, लेकिन आखिरकार 29 अगस्त 2025 को उसकी मौत हो गई। 😢
कौन थी पीड़िता? 👩
पीड़िता का नाम गुल फ़िज़ा (या गुलफिज़ा) था। उसकी उम्र सिर्फ़ 23 साल थी। एक साल पहले ही उसकी शादी अमरोहा के काला खेड़ा गाँव (दिदौली थाना क्षेत्र) के परवेज़ से हुई थी। शादी के बाद से ही उसके ससुरालवाले उस पर ₹10 लाख और एक कार लाने का दबाव डाल रहे थे। 🚗💰
कैसे हुआ यह दर्दनाक हादसा? ⚠️
11 अगस्त 2025 को गुलफ़िज़ा को उसके ही घरवालों ने प्रताड़ित किया और जबरन एसिड पिला दिया। एसिड पीने के बाद उसकी हालत बेहद गंभीर हो गई। उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ 17 दिन तक डॉक्टरों ने उसे बचाने की कोशिश की। लेकिन आखिरकार 29 अगस्त को उसने दम तोड़ दिया। 💔
परिवार का आरोप और पुलिस की कार्रवाई 🚨
गुलफ़िज़ा के पिता फुरकान ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने साफ आरोप लगाया कि उनकी बेटी को दहेज के लिए लगातार प्रताड़ित किया जाता था। जब उन्होंने माँग पूरी करने से मना किया, तो उसे एसिड पिलाकर मारने की कोशिश की गई।
पुलिस ने इस मामले में पति परवेज़ समेत 7 लोगों पर केस दर्ज किया है। इन आरोपियों के नाम हैं:
- परवेज़ (पति)
- आसिम
- गुलिस्ता
- मोनिश
- सैफ
- डॉ. भूरा
- बब्बू
इन सभी पर आईपीसी की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ है, जिसमें दहेज निषेध अधिनियम, हत्या की कोशिश और क्रूरता शामिल है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद अब उन पर 302 हत्या की धारा भी लगाई जाएगी।
17 दिन की दर्दनाक जंग 🏥
गुलफ़िज़ा ने एसिड पीने के बाद 17 दिन तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ी। डॉक्टरों ने बताया कि एसिड से उसके शरीर के अंदरूनी हिस्से बुरी तरह जल चुके थे। खाना-पीना तक संभव नहीं हो पा रहा था। परिवारजन दिन-रात उसकी सलामती के लिए दुआएँ करते रहे, लेकिन आखिरकार वह जिंदगी की लड़ाई हार गई। 😭
दहेज की प्रथा पर फिर सवाल ❓
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि दहेज की प्रथा आज भी समाज में कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए है। कानून होने के बावजूद आए दिन ऐसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक बेटियाँ इस तरह दहेज की आग में जलती रहेंगी? 💔
लोगों की प्रतिक्रिया 🙏
इस घटना के बाद पूरे अमरोहा और आसपास के जिलों में गुस्से का माहौल है। लोग सड़क पर उतरकर न्याय की मांग कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग सरकार और पुलिस से सख्त कार्रवाई की अपील कर रहे हैं।
दहेज से जुड़े कानून 📜
भारत में दहेज निषेध अधिनियम 1961 के तहत दहेज लेना-देना दोनों ही अपराध हैं। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराएँ भी लागू होती हैं, जैसे:
- धारा 304B – दहेज मृत्यु
- धारा 498A – क्रूरता
- धारा 302 – हत्या
इसके बावजूद इस तरह की घटनाओं का होना कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
गुलफ़िज़ा की कहानी ने छोड़ा सवाल 🌍
गुलफ़िज़ा की मौत सिर्फ़ एक लड़की की मौत नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक आईना है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम 21वीं सदी में रहकर भी ऐसे जालिम रिवाज़ों से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहे हैं? 👩👧
अब आगे क्या? 🔍
पुलिस की टीमें आरोपियों की तलाश में लगातार दबिश दे रही हैं। परिवार और स्थानीय लोग चाहते हैं कि दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा दी जाए ताकि भविष्य में कोई और बेटी इस हालात का शिकार न बने।
निष्कर्ष ✍️
अमरोहा की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि दहेज की कुप्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए सिर्फ़ कानून नहीं, बल्कि समाज को भी जागरूक होना पड़ेगा। बेटियाँ बोझ नहीं होतीं, बल्कि परिवार और समाज का गौरव होती हैं। 🙌
समाज और परिवार की भूमिका 🏠
इस घटना ने यह भी उजागर किया है कि कई बार परिवार अपनी बेटियों को चुप रहने की सलाह देते हैं। “ससुराल है, सब झेलो” जैसी मानसिकता लड़कियों को और बड़ी मुश्किल में डाल देती है। समाज को यह समझना होगा कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना ही सही रास्ता है। ✊
महिलाओं की सुरक्षा और सरकार की जिम्मेदारी 🏛️
उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है कि ऐसे मामलों में त्वरित न्याय दिलाया जाए। अगर आरोपी लंबे समय तक फरार रहते हैं तो यह कानून पर लोगों का भरोसा तोड़ देता है। इसके लिए विशेष अदालतें और फास्ट-ट्रैक कोर्ट ज़रूरी हैं ताकि पीड़ित परिवार को जल्दी न्याय मिले।
दहेज प्रथा से निपटने के उपाय 🌱
दहेज की समस्या को खत्म करने के लिए केवल कानून काफी नहीं है। इसके लिए समाज को भी जागरूक करना होगा:
- शादी में दहेज न लेने और न देने की शपथ लें।
- स्कूल और कॉलेज स्तर पर दहेज विरोधी अभियान चलाए जाएँ।
- समाज में बेटियों को बोझ नहीं, संपत्ति समझा जाए।
- मीडिया और फिल्मों को भी दहेज विरोधी संदेश फैलाना चाहिए।
दूसरे ऐसे मामले 🔎
गुलफ़िज़ा का मामला कोई पहला नहीं है। हर साल देशभर में हजारों महिलाएँ दहेज की वजह से जान गंवा देती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार हर साल 6000 से ज़्यादा दहेज हत्याएँ दर्ज होती हैं। यह संख्या बताती है कि समस्या कितनी गंभीर है।
निष्कर्ष ✍️
अमरोहा की यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि दहेज की कुप्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए सिर्फ़ कानून नहीं, बल्कि समाज को भी जागरूक होना पड़ेगा। बेटियाँ बोझ नहीं होतीं, बल्कि परिवार और समाज का गौरव होती हैं। 🙌